नई दिल्ली/वाशिंगटन | CCN रिपोर्ट
जलवायु वैज्ञानिकों के शोध पर बढ़ता दबाव, क्या खतरे में है वैज्ञानिक स्वतंत्रता?
जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए वैज्ञानिक वर्षों तक आंकड़ों का अध्ययन करते हैं, मौसम के बदलते पैटर्न का विश्लेषण करते हैं और कई तरह के प्रयोगों के जरिए निष्कर्ष तक पहुंचते हैं। लेकिन अब अमेरिका में जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाले कुछ वैज्ञानिकों के सामने एक नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। उनके शोध से जुड़े ईमेल, दस्तावेजों और संस्थागत बातचीत को सार्वजनिक करने की मांग ने वैज्ञानिक स्वतंत्रता और शोध की गोपनीयता को लेकर बहस छेड़ दी है।
Nature पत्रिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2024 से जलवायु एट्रिब्यूशन साइंस से जुड़े मामलों में अमेरिकी विश्वविद्यालयों को 30 से अधिक सार्वजनिक रिकॉर्ड अनुरोध मिले हैं। इन अनुरोधों के जरिए शोधकर्ताओं के काम से जुड़े दस्तावेज और पत्राचार मांगे गए हैं।
सवाल यह है कि आखिर जलवायु विज्ञान से जुड़े शोध में इतनी दिलचस्पी क्यों बढ़ रही है? और क्या इन मांगों का असर वैज्ञानिकों के काम करने के तरीके पर भी पड़ सकता है?
जलवायु विज्ञान अदालतों तक कैसे पहुंचा?
जलवायु एट्रिब्यूशन साइंस, यानी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने वाला विज्ञान, आज पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। इसके जरिए वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि इंसानों की गतिविधियों से बढ़ते वैश्विक तापमान ने भीषण गर्मी, भारी बारिश, बाढ़ और सूखे जैसी घटनाओं की संभावना या तीव्रता को किस हद तक प्रभावित किया है।
मसलन, किसी इलाके में असामान्य गर्मी पड़ने पर वैज्ञानिक केवल तापमान के आंकड़े नहीं देखते। वे यह भी अध्ययन करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटना होने की संभावना कितनी बढ़ी और उसका प्रभाव कितना गंभीर हुआ।
ऐसे शोध अब केवल वैज्ञानिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन से जुड़े कुछ मुकदमों में भी इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। जीवाश्म ईंधन कंपनियों और बड़े उत्सर्जकों की जवाबदेही से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक निष्कर्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यही वजह है कि इन शोधों से जुड़े दस्तावेज और वैज्ञानिकों के आंतरिक संवाद भी विवाद का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
वैज्ञानिकों को किस बात की चिंता है?
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कानूनी फर्मों और संगठनों ने विश्वविद्यालयों से वैज्ञानिकों के ईमेल, शोध संबंधी दस्तावेज और दूसरे संस्थागत रिकॉर्ड मांगे हैं। इनमें ‘पैट्रियट्स फाउंडेशन’ का नाम भी सामने आया है।
सार्वजनिक संस्थानों से रिकॉर्ड मांगना अपने आप में गैरकानूनी या अनुचित नहीं है। अमेरिका में संबंधित कानूनों के तहत नागरिक कुछ संस्थागत दस्तावेज मांग सकते हैं। लेकिन चिंता तब पैदा होती है, जब अनुरोधों का दायरा बहुत बड़ा हो, वे बार-बार किए जाएं या उनके कारण शोधकर्ताओं को अपने वास्तविक काम से काफी समय निकालना पड़े।
वैज्ञानिकों के लिए शोध केवल प्रकाशित रिपोर्ट तक सीमित नहीं होता। किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले कई विचारों पर चर्चा होती है, आंकड़ों की जांच की जाती है और गलतियों को सुधारने के लिए लगातार काम किया जाता है।
यदि इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े संवादों को बार-बार सार्वजनिक करने की मांग की जाए, तो शोधकर्ताओं को यह चिंता हो सकती है कि उनकी अधूरी टिप्पणियों या शुरुआती विचारों को गलत संदर्भ में पेश किया जाएगा।
इससे एक और सवाल उठता है: क्या वैज्ञानिक भविष्य में अपने सहयोगियों के साथ खुलकर विचार साझा करने से बचने लगेंगे?
राजनीति और विज्ञान के बीच बढ़ता टकराव
अमेरिका में जलवायु परिवर्तन लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है। इस बार भी वैज्ञानिक शोध और उससे जुड़ी न्यायिक सामग्री राजनीतिक विवाद के केंद्र में है।
रिपोर्ट में अमेरिकी कांग्रेस की रिपब्लिकन नेतृत्व वाली समिति द्वारा जलवायु एट्रिब्यूशन पर न्यायाधीशों के लिए तैयार एक मैनुअल की जांच का उल्लेख किया गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इस सामग्री की आलोचना की है।
हालांकि, किसी वैज्ञानिक अध्ययन या मार्गदर्शिका की आलोचना करना अपने आप में गलत नहीं है। विज्ञान में सवाल उठाना और निष्कर्षों की जांच करना जरूरी है। लेकिन आलोचना का आधार राजनीतिक असहमति के बजाय उपलब्ध साक्ष्य, शोध की पद्धति और वैज्ञानिक तथ्यों को होना चाहिए।
इसी तरह, यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी कि हर सार्वजनिक रिकॉर्ड अनुरोध का उद्देश्य वैज्ञानिकों को परेशान करना है। इसके लिए संबंधित मामलों के तथ्यों और उनके वास्तविक प्रभावों की जांच जरूरी है।
क्या इससे वैज्ञानिक शोध प्रभावित हो सकता है?
जलवायु वैज्ञानिकों की चिंता केवल दस्तावेज उपलब्ध कराने में लगने वाले समय तक सीमित नहीं है। उन्हें यह भी डर हो सकता है कि लगातार कानूनी और राजनीतिक दबाव के कारण शोध का माहौल प्रभावित होगा।
किसी विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों को स्वतंत्र रूप से सवाल उठाने, अलग-अलग संभावनाओं पर विचार करने और अपने निष्कर्षों की समीक्षा करने का अवसर मिलना चाहिए। यदि उन्हें लगे कि उनकी हर आंतरिक चर्चा विवाद का विषय बन सकती है, तो वे अपने विचार व्यक्त करने में अधिक सतर्क हो सकते हैं।
हालांकि, इस तरह के दबाव का वैज्ञानिक शोध पर कितना वास्तविक असर पड़ रहा है, इसे समझने के लिए और प्रमाणों की जरूरत है।
यहां संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। सार्वजनिक धन से होने वाले शोध में पारदर्शिता और जवाबदेही होनी चाहिए। लेकिन पारदर्शिता के नाम पर ऐसी प्रक्रिया भी नहीं बननी चाहिए जो शोधकर्ताओं के लिए अनावश्यक बाधा बन जाए।
असली सवाल क्या है?
जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने मौजूद गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। इसके प्रभावों को समझने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय वैज्ञानिक शोध जरूरी है। साथ ही, वैज्ञानिक संस्थानों को अपने काम के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए।
इसलिए बहस केवल इस बात पर नहीं है कि विश्वविद्यालयों से दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं। असली सवाल यह है कि इन अनुरोधों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से हो रहा है, उनका दायरा कितना उचित है और क्या उनसे वैज्ञानिकों के काम पर अनावश्यक दबाव पड़ रहा है।
विज्ञान को सवालों से बचाने की जरूरत नहीं है, लेकिन सवाल पूछने की प्रक्रिया भी निष्पक्ष होनी चाहिए। वैज्ञानिक निष्कर्षों को चुनौती दी जानी चाहिए तो ठोस प्रमाणों के आधार पर, न कि राजनीतिक आरोपों या संदर्भ से अलग किए गए दस्तावेजों के सहारे।
क्योंकि जलवायु परिवर्तन को समझने की लड़ाई में केवल सही आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि यह भी जरूरी है कि वैज्ञानिक बिना अनुचित दबाव के उन आंकड़ों का अध्ययन कर सकें।