द गार्डियन के अनुसार मशहद की रहने वाली नजमेह अमीनी पर पैगंबर मोहम्मद पर कथित अपमानजनक पोस्ट सोशल मीडिया पर डालने के करण, जनवरी 2026 में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उनको गिरिफ्तार किया गया, बाद में अमीनी खिलाफ दो अलग-अलग आपराधिक मामले चले जिसके बाद नजमेह अमीनी को मौत की सजा सुनाई गयी है।
ईरान में 23 वर्षीय अकाउंटिंग की छात्रा नजमेह अमीनी को सोशल मीडिया पर कथित रूप से पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के मामले में मौत की सजा सुनाए जाने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।
मशहद शहर की रहने वाली अमीनी फिलहाल मशहद की वकीलाबाद जेल में बंद हैं। उनकी मौत की सजा पर अभी अंतिम मुहर नहीं लगी है और इसके खिलाफ ईरान के सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। इस मामले ने एक बार फिर ईरान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों और मृत्युदंड से जुड़े कानूनों पर बहस तेज कर दी है।
कौन हैं नजमेह अमीनी?
नजमेह अमीनी ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर मशहद की रहने वाली 23 वर्षीय छात्रा हैं। वह अकाउंटिंग की पढ़ाई कर रही थीं। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें जनवरी 2026 में ईरान में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिया गया था।
मानवाधिकार संगठन HRANA के अनुसार, अमीनी को 31 जनवरी को मशहद के फरदौसी शॉपिंग सेंटर से हिरासत में लिया गया था। वहीं, ईरान ह्यूमन राइट्स नामक संगठन ने उनकी गिरफ्तारी की तारीख 3 फरवरी बताई है।
शुरुआत में उनके परिवार को लगा कि सोशल मीडिया पर प्रदर्शनों से जुड़ी गतिविधियों के कारण उन्हें निशाना बनाया गया है। हालांकि, बाद में उनके खिलाफ दो अलग-अलग आपराधिक मामले सामने आए। इनमें से एक मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार विरोधी गतिविधियों से संबंधित था, जबकि दूसरे में धार्मिक अपमान का आरोप लगाया गया।
सोशल मीडिया पोस्ट के लिए क्यों सुनाई गई मौत की सजा?
नजमेह अमीनी को ईरान में ‘सब-अल-नबी’ (Sab al-Nabi) नामक अपराध के तहत मौत की सजा सुनाई गई। इस अपराध का संबंध पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने से है। हालांकि, जिस सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर यह कार्रवाई हुई, उसकी वास्तविक सामग्री सार्वजनिक नहीं की गई है।
ईरान ह्यूमन राइट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई खोरासान रजावी प्रांत की आपराधिक अदालत की छठी शाखा में हुई। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने अमीनी की ओर से पेश किए गए बचाव को स्वीकार नहीं किया।
ईरानी अखबार ‘खोरासान’ की रिपोर्ट के अनुसार, अमीनी ने अदालत में कहा था कि उन्होंने दोस्तों के साथ मतिभ्रम पैदा करने वाले मशरूम का सेवन किया था और उसी अवस्था में सोशल मीडिया पर संबंधित टिप्पणी पोस्ट कर दी थी। उनके वकील ने भी कथित तौर पर इसे अनजाने में हुई गलती बताया।
लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।
क्या कहता है ईरान का कानून?
ईरान की इस्लामिक दंड संहिता की धारा 262 के तहत पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के अपराध में मौत की सजा का प्रावधान है।
वहीं, धारा 263 में कुछ परिस्थितियों में अपवादों का उल्लेख है। इनमें अनजाने में कही गई बात, नशे की स्थिति या जुबान फिसलने जैसी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं। अमीनी के मामले में अदालत ने उनके बचाव को स्वीकार नहीं किया।
हालांकि, उनकी मौत की सजा अभी अंतिम नहीं है। इसे ईरान के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस सजा को बरकरार नहीं रखा है।
मौत की सजा के अलावा 12 साल से अधिक की कैद
नजमेह अमीनी को एक अन्य मामले में भी लंबी जेल की सजा सुनाई गई है। मशहद की क्रांतिकारी अदालत ने उन्हें 12 साल, छह महीने और एक दिन की कैद की सजा दी।
HRANA के अनुसार, इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों और ईरानी शासन के विरुद्ध प्रचार करने जैसे आरोप शामिल थे। यह मामला उस आपराधिक मुकदमे से अलग था, जिसमें उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।
इस तरह अमीनी को दो अलग-अलग मामलों में सजा का सामना करना पड़ रहा है।
जेल से नजमेह अमीनी ने क्या अपील की?
सितंबर में जारी एक ऑडियो संदेश में अमीनी ने संयुक्त राष्ट्र, वकीलों और मानवाधिकार संगठनों से उनके मामले में हस्तक्षेप करने और इसकी जांच करने की अपील की थी।
‘द गार्जियन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने संदेश में कहा था, “मैं आज खुद को नायक नहीं बनाना चाहती। मैं सिर्फ एक बात चाहती हूं—मेरी आवाज बनिए।”
उनकी इस अपील के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान देने की मांग की।
ईरान ह्यूमन राइट्स के निदेशक महमूद अमीरी-मोगद्दम ने चेतावनी दी कि ऑनलाइन अभिव्यक्ति के लिए मौत की सजा का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विचारों और अभिव्यक्ति के खिलाफ मृत्युदंड के दायरे को बढ़ा सकता है। संगठन ने अमीनी की सजा रद्द करने की मांग की है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर फिर उठे सवाल
नजमेह अमीनी का मामला केवल एक छात्रा को सुनाई गई सजा तक सीमित नहीं है। इससे यह सवाल भी उठता है कि सोशल मीडिया पर की गई किसी टिप्पणी के लिए आपराधिक कार्रवाई की सीमा क्या होनी चाहिए और ऐसे मामलों में आरोपी को अपने बचाव का कितना अवसर मिलता है।
एक ओर ईरान के कानून में धार्मिक अपमान के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है, तो दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि अभिव्यक्ति से जुड़े मामलों में मृत्युदंड का इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है।
फिलहाल, अमीनी की मौत की सजा अंतिम न्यायिक समीक्षा के अधीन है। उनकी अपील का परिणाम क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन उनके मामले ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान ईरान की न्यायिक व्यवस्था, ऑनलाइन अभिव्यक्ति की सीमाओं और मानवाधिकारों से जुड़े सवालों की ओर खींचा है।