संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि तेजी से मजबूत हो रहा El Niño मौसम तंत्र भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों के लिए गंभीर जलवायु चुनौतियाँ लेकर आ सकता है। इसके कारण भारत के मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है, जिससे कृषि, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ सकता है।
El Niño होगा और अधिक प्रभावी
WMO द्वारा जारी नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, अगस्त से अक्टूबर 2026 के बीच El Niño के और अधिक मजबूत होने की संभावना है। इसके चलते वैश्विक तापमान में वृद्धि होगी तथा विभिन्न क्षेत्रों में मौसम के चरम रूप देखने को मिल सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होगी, जबकि कई इलाकों में सूखे जैसी परिस्थितियाँ बनने का अनुमान है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्रों में पहले से जारी असामान्य हीटवेव आगे और तेज़ हो सकती हैं। WMO ने चेताया है कि कुछ समुद्री क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 2.9 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रह सकता है।
भारतीय मानसून पर संकट के बादल
भारत की कृषि व्यवस्था मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। WMO के पूर्वानुमान के अनुसार, हिंद महासागर क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है, जिससे भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो किसानों की फसलों, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
कम वर्षा के कारण सूखे की स्थिति बनने के साथ-साथ मौसम की अनिश्चितता बाढ़ और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम भी बढ़ा सकती है।
दुनिया के अन्य क्षेत्रों पर भी असर
El Niño का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। पूर्वानुमान के अनुसार—
- भूमध्यरेखीय अफ्रीका, दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्सों और उत्तरी अमेरिका में सूखी परिस्थितियाँ विकसित हो सकती हैं।
- वहीं दक्षिणी यूरोप, मध्य एशिया और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है।
“धरती आग की लपटों में” — एंतोनियो गुतारेस
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि El Niño पहले से जारी जलवायु संकट को और गंभीर बना रहा है।
उन्होंने कहा कि दुनिया पहले ही भीषण गर्मी, विनाशकारी जंगल की आग और इतिहास के सबसे गर्म समुद्रों का सामना कर रही है। El Niño इन परिस्थितियों को और अधिक गंभीर बना रहा है। गुतारेस ने जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के विस्तार पर तत्काल रोक लगाने और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने विशेष रूप से श्रमिकों और बाहरी वातावरण में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अत्यधिक गर्मी प्रतिदिन दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की जान ले रही है।
यूरोप में पहले ही दिखने लगे हैं असर
इस वर्ष यूरोप के कई देशों में चरम मौसम की घटनाएँ देखने को मिली हैं। ब्रिटेन में मई के दौरान रिकॉर्ड स्तर की हीटवेव दर्ज की गई, जबकि फ्रांस और स्पेन में जंगल की भीषण आग ने अनेक गाँवों को प्रभावित किया और लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
सरकारों से तैयारी की अपील
WMO की महासचिव सेलेस्ते साउलो ने सभी देशों की सरकारों से अपील की है कि वे संभावित गर्मी, सूखे, बाढ़ और अन्य मौसम संबंधी आपदाओं से निपटने के लिए अभी से तैयारी शुरू करें।
उन्होंने कहा कि मौसम संबंधी पूर्वानुमान केवल संभावित खतरे की जानकारी देते हैं, लेकिन प्रभावी नीतियाँ, समय पर तैयारी और सामूहिक प्रयास ही इन जोखिमों को कम कर सकते हैं। आज लिए गए निर्णय आने वाले महीनों और वर्षों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को निर्धारित करेंगे।
निष्कर्ष
El Niño के बढ़ते प्रभाव और जलवायु परिवर्तन की तीव्र होती चुनौतियाँ स्पष्ट संकेत देती हैं कि वैश्विक स्तर पर तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए मानसून में किसी भी प्रकार की कमी केवल मौसम का मुद्दा नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा विषय है। ऐसे में वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेते हुए सरकारों, संस्थानों और समाज को मिलकर जलवायु अनुकूल रणनीतियाँ अपनानी होंगी।